Tuesday, 16 December 2014

'सत्यम ब्रूयात, प्रियं ब्रूयात, मा ब्रूयात सत्यम अप्रियम' सत्य बोलो और प्रिय बोलो। अप्रिय सत्य नहीं बोलना चाहिए। सत्य बोलना स्वयं में एक अत्यंत ही दुष्कर कार्य है। लोग सच बोलने से बचना चाहते हैं। मैं इस बात से इनकार नहीं कर सकता कि ऐसी परिस्थितियाँ उत्पन्न हो सकती हैं जब झूठ बोलना अपरिहार्य हो जाता है। मेरी सोच अलग है। मैं समझता हूँ कि सत्य बोलना सबसे आसान कार्य है क्योंकि जैसे एक झूठ को छिपाने के लिए सौ झूठ बोलना पड़ता है वैसा सत्य बोलने में नहीं है। झूठ बोलने की अपनी समस्याएं हैं एक झूठ को छिपाने के लिए कितने झूठ पर झूठ बोलने पड़ते हैं। सत्य बोलना आसान होने पर भी लोग सत्य बोलने से परहेज करना पसंद करते हैं। दुनिया में शायद ही ऐसा कोई हो जो हमेशा सच ही बोलता हो। बहुसंख्यक लोगों का मानना है कि सत्य हमेशा कड़वा होता है। कड़वा सत्य शायद ही कोई हज़म कर पाता हो। कड़वा सत्य सुनना कोई पसंद नहीं करता। तो क्या मूक रहा जाए? मौनव्रत धारण करना तो अत्याचार, अन्याय और भ्रष्टाचार को मौन समर्थन देने के समान होगा।

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