पुरुष सत्तात्मक समाज में यूँ तो पुरुष की प्रधानता तो होती ही है लेकिन नारी प्रताड़ना के लिए अकेले पुरुष को दोषी नहीं ठहराया जा सकता। कई मामलों में पुरुष महिलाओं को मदद ही पहुंचाते हैं। अगर किसी घर में कोई कन्या जन्म ले ले तो सबसे ज्यादा दुखी औरतें ही होती हैं। पुत्र मोह तो औरतों को ज्यादा होता है । यह कैसी बिडम्बना है कि एक औरत ही औरत की दुश्मन बन जाती है और नाम बदनाम पुरुष का होता है। क्या समाज को सही दिशा देने में स्त्री का हाथ नहीं होता? माँ तो हमारी पहली शिक्षक होती है। कहते है एक औरत शिक्षित रहे तो पूरा परिवार शिक्षित हो जाता है। मुझे तो लगता है समाज को बदलने में औरत का महत्वपूर्ण योगदान है। आप क्या कहते हैं ?
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